मोबाइल न बन जाए परेशानी


-जयपराइट्ïस नहीं मोबाइल वेस्ट के खतरे से अवेयर

जयपुर। पहले ब्लैक एंड व्हाइट फोन्स, फिर कलर स्क्रीन मोबाइल, फिर सिंगटोन, केमरा, एमपी थ्री, वॉइस व विडियो रिकोर्डिंग वाली सुविधा वाले मोबाइल फोन का क्रेज बढ़ा और खरीदारी भी। हरकोई अपने पुराने सेल के बदले नए फिचर्स वाला हैंडसेट खरीदना चाहता है। हर महीने हजारों नए मोबाइल खरीदे जा रहे हैं। लेकिन नए के पीछे छुट जाने वाले ओल्ड व अनयुज्ड मोबाइल फोन्स के बारे में कभी सोचा है? क्या होता है उनका? घर में ड्रावर्स में तो कहीं कबाड़ में ही उनको जगह मिलती है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इनका 90 प्रसेंट मैटरियल रिसाइकिल हो सकता है। बशत्र्ते उसे कचरे में न फैंक कर रिसाइकिल काउंटर तक पहुंचाया जाए।

लोगों जानकारी नहीं

रिसाइकिलिंग को लेकर भारत सहित 13 देशों के 6500 लोगोंं के बीच नोकिया कम्पनी के एक सर्वे में लोगों के मोबाइल फोन्सकी रिसाइकिलिंग रूझान का पता लगया गया। इस ग्लोबल सर्वे में तथ्य सामने आया कि अधिकतर लोगों के ओल्ड व अनयुज्ड मोबाइल ड्रॉवर्स में ही रहते हैं, इनमें आधे से ज्यादा लोगों को तो ये भी पता नहीं कि उनके मोबाइल भी रिसाइकिल हो सकते हैं। मोबाइल डिवाइसेज को रिसाइकिल प्रोसेस में महज 3 प्रतिशत लोग ही डालते हैं। 75 प्रतिशत लोगों ने अपने मोबाइल्स के रिसाइकिलिंग के लिए कभी सोचा नहीं तथा इनमें से आधे से ज्यादा लोगों को तो इसके बारे में पता भी नहीं था।

रिसाइकिल से फायदा

मोबाइल फोन्स प्रोडक्ट्ïस में से 90 प्रतिशत मेटरियल्स को काम में लिया व रियूज किया जा सकता है, प्लास्टिक्स, सिल्वर, गोल्ड व कॉपर जैसे मेटरियल्स से ज्वैलरी, स्टेनलैस स्टील प्रोडक्ट और प्लास्टिक पोस्ट्ïस बनाए जा सकते हैं। रिसाइकिल से मोबाइल, बैट्री व एसेसरीज के ई-वेस्ट की समस्या से बचा जा सकता है साथ पर्यावरण को दूषित होने से बचाया जा सकता है।

तो बने बात...

मोबाइल फोन रिसाइकिलिंग के लिए राष्टï्रीय स्तरीय संस्था का गठन हो, जिसके जरिए अनयुज्ड व ओल्ड हैंडसेट, बैटरीज व एसेसरीज को कलेक्ट किया जाए। इसमें मोबाइल फोन रिटैलर्स, लॉकल कॉन्सिल्स, गवर्नमेंट एजेन्सियों को शामिल किया जाए। और देशभर में जगह-जगह अनयुज्ड व ओल्ड फोन्स ड्रोप सेंटर्स की स्थापना की जाए। ऑस्ट्रेलिया में ऐसा ही ऑफिशियल नेशनल रिसाइकिलिंग प्रोग्राम चल रहा है। इसमें आई मेट, एलजी इलैक्ट्रोनिक्स, मोटोरोला, नोकिया, एनईसी, पेनासोनिक, सेमसंग, शार्प व सोनी इरक्शन आदि कम्पनियां भी शामिल हैं।

घर में, कबाड़ में है खतरा

पुराने मोबाइल फोन्स को अधिकतर लोग बच्चों को खिलौने के रूप में दे देते हैं जो उनके लिए खतरनाक है। डॉक्टर्स के अनुसार इनसे बच्चों को स्किन प्रोब्लम्स का खतरा बना रहता है। ई-वेस्ट ग्रीनहाउस के लिए भी खतरा बना हुआ है।




रिसाइकिल से यहां के लोगों को कोई लेना देना नहीं है। लोग नया मोबाइल खरीदने के बाद पुराना आधी कीमत में बेच देते हैं। ये बेचने का क्रम सालों चलता है और अंत में रिटेलर से होते हुए सर्विस सेंटर्स तक पहुंचते हैं। यहां उनके पार्ट काम में लिए जाते हैं।

-टीटू तलवार, रेज मोबाइल।

हमारे मोबाइल फोन्स के रिसाइकिल के बारे में मुझे कोई जानकारी नहीं है।

-समित, ब्रांच मैनेजर, एलजी।

एक 'कतरा' जिन्दगी ...passion of blood donors of jaipur


जरूरतमंद के लिए खून के हर कतरे में जिंदगी बसती है, समय रहते इसे उपलब्ध करवाकर किसी व्यक्ति को जीवनदान दिया जा सकता है। इस भावना से शहर के कई लोग पिछले कई वर्र्षों से ब्लड डोनेशन को जिन्दगी के उद्देश्यों में शामिल किए हुए हैं। वल्र्ड ब्लड डोनर-डे पर आइए इन्हीं लोगों के ब्लड डोनेट करने के संकल्प के बारे में जानते हैं।
जयपुर। जहां आज भी बहुत से लोग ब्लड डोनेट करने में हिचकते हैैं, वहीं शहर के इन लोगों ने सैकड़ों जिंदगियों को मौत के मुंह में जाने से बचाया है। जरूरतमंदों के लिए ब्लड डोनेट करने का इनका संकल्प इनके लिए जुनून से कम नहीं है। ब्लड डोनेशन कैंप में ये लोग सबसे आगे होते हैं, साथ ही जरूरत पडऩे पर हॉस्पिटल्स में भी ब्लड डोनेट करते हैं। ब्लड डोनेट को लेकर सारी भ्रांतियां निर्मूल हैं।
ट्रेजडी से सबक
मेरे एक परिचत काएक्सीडेंट होने पर जब उसे एसएमएस हॉस्पिटल एडमिट करवाया गया, तो उसकी हालात नाजुक थी। समय पर ब्लड नहीं मिलने से वह नहीं बच सका। इस ट्रेजडी ने मुझे ब्लड डोनेट करने को प्रेरित किया। इसके बाद जब कभी किसी भी ब्लड डोनेशन कैंप में मौका मिला, मैं ब्लड डोनेट करने में सबसे आगे रहा। अब तक मैं 37 बार ब्लड डोनेट कर चुका हूं। ब्लड डोनेशन से मुझे आत्म संतुष्टि मिलती है। मेरा मानना है कि इमरजेंसी के समय में हमारे रक्त की एक-एक बूंद किसी को जिंदगी देती है।- सुशील शर्मा, मुरलीपुरा
तभी से संकल्प
हमारे गांव में एक परिचित की सर्जरी होने वाली थी और उन्हें ब्लड की बेहद जरूरत थी। उस समय मैं 12वीं क्लास में पढ़ता था। बड़ी कोशिशों के बाद भी ब्लड की व्यवस्था नहीं हो पाई, मेरी उम्र कम होने से डॉक्टर्स ने ब्लड लेने से इनकार कर दिया। परिचित की जान बड़ी मुश्किल से बच पाई, आगे से मैंने ब्लड डोनेट करने का संकल्प कर लिया था। अभी तक 28 बार डोनेट कर चुका हूं। आज भी ऐसे बहुत मौके आते हैं, जब इस तरह से लोगों को तुरंत ब्लड की जरूरत होती है और मैं तैयार रहता हूं।- छोटूराम डूडी, वैशाली नगर

दिखावा नहीं ब्लड डोनेशन
मैं पिछले 10 वर्र्षों से लगातार ब्लड डोनेट करता आ रहा हूं। अब तक 20 बाद ब्लड डोनेट कर चुका हूं। पिछले साल भी 6 बार ब्लड डोनेट किया, ब्लड डोनेशन के इस काम में मेरे परिवार के सदस्य मेरा पूरा सहयोग दे रहे हैं। मेरा ब्लड डोनेट करने का सिलसिला शुरू होने के बाद कभी नहीं रुका। जब कभी जरूरतमंदों के फोन आते हैं अथवा ब्लड डोनेशन कैंप लगते हैं, तो मैं खुद ब खुद वहां पहुंच जाता हूं। ये काम दिखावे का नहीं है, मानवता के लिए बन पड़े उतना कर दिखाने का है। मैं लोगों से यही अपील करना चाहता हूं कि ब्लड देने से किसी तरह की कोई परेशानी नहीं होती, अगर आप स्वस्थ हैं, तो ब्लड डोनेट जरूर करें। - अनिल भाटिया, एमआई रोड

जिंदगी बचाने का जुनून
स्कूल टाइम में स्काउट के रूप में मेरा जुड़ाव सामाजिक सरोकार से जुड़े कार्यक्रमों से रहा। स्कूल के बाद सिविल डिफेंस से जुड़कर ब्लड डोनेशन के लिए मोटिवेटशन प्रोग्राम्स में भी सक्रिय भागीदार बना। धीरे-धीरे ब्लड डोनेट करना मेरा रूटीन बन गया, जब कहीं ब्लड डोनेशन कैंप लगता मैं उसमें जरूर जाता, साथ ही किसी भी बड़े त्योहार या खुद के जन्मदिन पर ब्लड डोनेट करना मेरा शगल बन गया है। अब तक मैं 16 बार ब्लड डोनेट कर चुका हूं। ब्लड डोनेशन के लिए रेड क्रॉस सोसायटी की ओर से मिले सम्मान ने मेरा उत्साहवर्धन किया है।- अरविंद कुमार शर्मा, डीसीएम

प्रण लेना जरूरी
ब्लड डोनेशन से आपको जो आत्म संतुष्टि मिलेगी उसे बयां करना मुश्किल है। इससे किसी तरह की कोई परेशानी नहीं होती। लेकिन इसके लिए आपको प्रण लेने की जरूरत है। मैंने अब तक 18 बार ब्लड डोनेट किया है और हर बार खुद को अधिक ऊर्जावान पाया। इस काम में जो सुकून मिलता है, किसी और कार्य में नहीं मिल सकता। अब मेरी फैमिली भी ब्लड डोनेट करने में सहयोग देती हैं। - विशाल शर्मा,
ज़रा भी न घबराएं
18 से 50 वर्ष उम्र का स्वस्थ व्यक्ति रक्तदान कर सकता है।
50 किग्रा वजन जरूरी है।हर छह माह में ब्लड रिनोवेट होता है, इसलिए रक्तदान से शारीरिक कमजोरी नहीं होती।रक्त के दो पार्ट होते हैं।
प्लाज्मा की भरपाई दो दिन में और सेल्यूलर पार्ट की भरपाई एक माह में हो जाती है।
रक्तदान करके आप दूसरे व्यक्ति को एक नया जीवन दे सकते हैं।
जरूरत पडऩे पर आपके परिजनों को भी रक्त उपलब्ध हो जाता है।
रक्तदान से शरीर में खून की कमी नहीं होती।

बड़े इरादों के प्रोजेक्ट

शहर के स्टूडेंट्ïस लगे हैं विकास की नई संभावनाओं की खोज में
जयपुर। क्या आप जानते हैं शास्त्री नगर स्थित ट्रेफिक पार्क किसी कॉलेज स्टूडेंट के प्रोजेक्ट के आधार पर विकसित किया गया है। जी हां, यह राज्य सरकार के डिपार्टमेंट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी की ओर से हायर स्टडीज के स्टूडेंट्ïस को उनके रिसर्च प्रोजेक्ट के लिए दिए जाने वाले प्रोत्साहन का ही नतीजा है। डिपार्टमेंट हर वर्ष विभिन्न कॉलेजों व संस्थाओं में अध्ययनरत स्टूडेंट्ïस के प्रोजेक्ट्ïस क ो ग्रांट प्रदान करता है और उन प्रोजेक्ट के महत्व के आधार पर उसके फ्यूचर आस्पेक्ट पर भी काम किया जाता है। इस बार भी डिपार्टमेंट ने शहर से 6 स्टूडेंट्ïस के प्रोजेक्ट्ïस को प्रोत्साहन व ग्रांट के लिए चुना है। मेडिकल, बायोटेक्नोलॉजी, बॉटनी, टैक्सटाइल व एन्वायर्नमेंटल स्टडी में अध्ययनरत ये स्टूडेंंट्ïस अपने दम पर वर्तमान परिस्थितियों को बदलना चाहते हैं। आइए जानते हैं उनके इन प्रोजेक्ट्ïस और उद्देश्यों के बारे में।
ये हैं प्रोजेक्ट
इलाज हो विदाउट साइड इफेक्ट
बायोटेक्नोलॉजी के स्टूडेंट अविनाश मारवाल अपने रिसर्च प्रोजेक्ट के माध्यम से त्वचा रोग फैलाने वाले कवकों (डर्मेटोफाइट्ïस) पर विभिन्न पादप आसव (प्लांट एक्स्ट्रेक्ट) के प्रभाव का अध्ययन कर रहे हैं। मारवाल का ये रिसर्च त्वचा रोगों के लिए प्रचलित एलोपैथी दवाओं के साइड इफेक्ट से बचते हुए सही उपचार की ओर एक अच्छा कदम है। इसमें विभिन्न त्वचा रोगों में पादप आसवों का प्रयोग कर बिना साइड इफेक्ट के उपचार का मार्ग प्रशस्त होता है। जेईसीआसी कैम्पस के महात्मा गांधी इंस्टीट्ïयूट ऑफ अप्लाइड साइंसेज में अविनाश को इस प्रोजेक्ट में गाइड कर रही अणिमा शर्मा कहती हैं कि पादव रस व आसवों का कोई दुष्प्रभाव मनुष्यों पर नहीं होता और इस रिसर्च में इनका इस्तेमाल उपचार के रूप में किया जाना ही महत्वपूर्ण है।
पर्यावरण बचाने की पहल
जयपुर नेशनल यूनिवर्सिटी में बायोटेक्नोलॉजी की स्टूडेंट रिद्धि के. सेम ने दूषित जल से सिंचिंत फसलों के इस्तेमाल से मनुष्य पर पडऩे वाले दुष्प्रभावों को ध्यान में रखकर अपना रिसर्च प्रोजेक्ट तैयार किया है। डॉ. दिव्या श्रीवास्तव के नेतृत्व में रिद्धि ऐसे उन पौधों की एब्जॉर्ब करने की क्षमता बढ़ाने पर काम कर रही हैं, जो पानी से हैवी मैटल्स व टॉक्सिक्स को सोखते हैं। डॉ. दिव्या बताती हैं कि शहर के अमानीशाह नाले व इंडस्ट्रियल एरिया में पानी में बहाए जाने वाले हैवी मैटल्स व डिस्चार्ज टॉक्सिक्स का इस्तेमाल सिंचाई में भी होता है। ऐसे में ये खतरनाक तत्व फल व सब्जियों के जरिए हमारे शरीर तक पहुंच जाते हैं। इस रिसर्च में ऐसे पौधे जो इन मैटल्स व टॉक्सिक्स को एब्जॉर्ब कर सकें, को तलाश कर उनकी तत्वों को सोखने की क्षमता को बढ़ाना है। क्योंकि एक क्षमता के बाद इन पौधों की एब्जॉर्ब करने की क्षमता खत्म हो जाती है। रिसर्च में जमीन से ऐसे बैक्टीरिया को खोजा जा रहा है, जो इन पौधों की एब्जॉर्ब क्षमता में इजाफा करेंगे।
डोमेस्टिक टैक्सटाइल मार्केट को नया आयाम
जयपुर की ट्रेडिशनल हैंड ब्लॉक प्रिंटिंग से तो सभी वाकिफ हैं, लेकिन अब डोमेस्टिक टैक्सटाइल मार्केट में इनोवेटिव क्वालिटी प्रोडक्ट चाहिए। आईसीजी की एमएससी होम साइंस की स्टूडेंट आरती शर्मा ने जेपनीज मोटिफ्स का इस्तेमाल करने की सोची। आरती ने डोमेस्टिक मार्केट में नए डिजाइन व ट्रेड की संभावनाओं पर काम किया। इस टैक्सटाइल प्रोजेक्ट से इंडस्ट्री को किफायती व क्वालिटी के साथ नए प्रयोगात्मक प्रोडक्ट की संभावनाएं हैं। आरती के अनुसार भले ही प्रदेश में सांगानेरी अथवा हैंड ब्लाक प्रिंटिंग का बड़ा मार्केट हो, लेकिन जेपेनीज मोटिफ्स के साथ स्क्रीन प्रिंटिंग वाला ये प्रोडक्ट भी सभी पसंद करेंगे।
हैपेटाइटिस-ई और प्रेग्नेंसी
एसएमएस मेडिकल कॉलेज के डिपार्टमेंट ऑफ गैस्ट्रोएन्ट्रोलॉजी की स्टूडेंट निधि सिंह हैपेटाइटिस-ई जो दूषित जल से फैलता है, पर अपना रिसर्च कर रही हैं। विभागाध्यक्ष डॉ.रमेश रूपराय के निर्देशन में निधि सामान्य अवस्था के मुकाबले प्रेग्नेंसी के दौरान हैपेटाइटिस-ई के संक्रमण की अधिक मृत्युदर पर शोध कर रही हैं। वे कहती हैं कि ऐसी स्थिति में प्रेग्नेंट महिला के लीवर फैल्योर की आशंका बढ़ जाती हैं और वे इस बात को गहराई से जानना व हल ढूंढना चाहती हैं कि ऐसा क्यों होता है। क्या यह वायरस के जीन अथवा प्रेग्नेंट महिला के शारीरिक बदलाव का नतीजा होता है? इस रिसर्च के बाद जो निष्कर्ष निकलेंगे उनके जरिए हैपेटाइटिस के गर्भवती महिलाओं पर असर व उपचार में मदद मिलेगी।
जान लेवा बन रहा पानी
पोद्दार इंटरनेशनल कॉलेज में एन्वायर्नमेंटल स्टडीज की स्टूडेंट सीता शर्मा अपनी गाइड डॉ.हिमानी तिवाड़ी के निर्देशन में सांगानेर में रंगाई-छपाई उद्योगों से दूषित पानी का बायोकेमिकल एनालिसिस एवं मनुष्य पर पडऩे वाले दुष्प्रभावों पर रिसर्च कर रही हैं। यहां के प्रदूषित पानी से आम आदमी के स्वास्थ्य पर पडऩे वाले असर को जानने के लिए वे यहां विभिन्न स्थानों से लिए पानी नमूनों का प्रयोग चूहों पर कर रही हैं। रिसर्च के दौरान चूहों पर प्रदूषित पानी से पडऩे वाले असर को वे अध्ययन का आधार बनाएंगी। सीमा कहती हैं कि पानी में मिले उन पदार्र्थों का भी अध्ययन कर रही हैं, जो मनुष्य के लिए अधिक खतरनाक है।
फ्लोराइड से बचाव की जुगत
ड्रिंकिंग वाटर में 1.5 पीपीएम फ्लोराइड की मात्रा का मानक सही है, लेकिन जो पानी हम पी रहे हैं उसमें ये संख्या 3 से 10 पीपीएम तक पहुंच गई है, जो कि क्षेत्र विशेष पर निर्भर है। जिसका दुष्प्रभाव कुछ ही वर्षों में हमारे शरीर पर साफ दिखाई देने लगता है। हड्डियां कमजोर पडऩे लगती हैं, व्यक्ति पर 40 की उम्र में ही 60 जैसा असर दिखने लगता है। फ्लोराइड का असर दांतों पर ही नहीं पूरे शरीर पर पड़ता है। राजस्थान यूनिवर्सिटी के डिपार्टमेंट ऑफ बॉटनी के प्रोफेसर केपी शर्मा के निर्देशन में दीपाली शर्मा इसी समस्या का समाधान ढूढने में लगी हैं। रिसर्च में मनुष्य शरीर द्वारा फ्लोराइड ग्रहण करने के बाद फ्लोराइड पर नियंत्रण व इसके साइड इफेक्ट्ïस से बचने के उपायों को तलाश रही हैं। जयपुर के आसपास के क्षेत्र में फ्लोराइड की समस्या विकट रूप ले चुकी है।
डिपार्टमेंट की ओर से स्टूडेंट्ïस का चयन उनके प्रोजेक्ट्ïस के आधार पर किया जाता है। साइंस एंड टेक्नोलॉजी से जुड़े इन प्रोजेक्ट्ïस पर विषय विशेषज्ञ अपनी राय देते हैं और इनकी उपादेयता पर भी टिप्पणी करते हैं। इस आधार पर चयनित स्टूडेंट्ïस को पन्द्रह हजार रुपए तक की ग्रांट भी दी जाती है। इनमें से बेहतरीन रिजल्ट को उसकी महत्ता व फ्यूचर आस्पेक्ट्ïस के आधार पर डवलप भी किया जाता है, ट्रेफिक पार्क इसी का उदाहरण है।- डॉ. अनिता गिल, प्रोजेक्ट डायरेक्टर, डीएसटी, राजस्थान सरकार

सब कुछ भूल आगे बढऩे का उत्साह

सीबीएसई बोर्ड की हेल्पलाइन पर 1000 से अधिक स्टूडेंट्ïस ने पूछा अब क्या करें?

जयपुर। सीबीएसई के बोर्ड एग्जाम्स के बाद बोर्ड की ओर से संचालित टेलीफोनिक काउंसलिंग में सैकड़ों स्टूडेंट्स ने फोन कॉल हैं। टेली काउंसलर्स की मानें तो स्टूडेंट्ïस में गजब का उत्साह रहा है। अधिकांश स्टूडेंट अपनी लास्ट परफॉर्मेंस भूलकर आगे के रास्तों पर उत्साह से बढऩा चाहते हैं। टॉपर्स जहां सही सब्जेक्ट चुनकर आगे भी अपनी पॉजिशन बनाए रखना चाहते हैं, वहीं एवरेज स्टूडेंट अपना प्रदर्शन सुधारने के लिए सही मार्गदर्शन लेने से नहीं हिचकिचा रहे हैं। उल्लेखनीय है कि बोर्ड ने स्टूडेंट की टेंशन कम करने के लिए हेल्पलाइन शुरू की थी, जो 3 जून तक चली। इसके जरिए स्कूल प्रिंसिपल्स, काउंसलर्स व मनोवैज्नानिकों ने 10वीं व 12वीं के स्टूडेंट्ïस को टेलीफोन व वेबसाइट पर ऑनलाइन कॅरियर गाइडेंस दी। शहर में भी इसके तहत दो काउंसलर्स नियुक्त किए गए, जिनके अनुसार टेली कॉउंसलिंग के जरिए उन्हें रोजाना 70 से 80 कॉल प्राप्त हुए।
माक्र्स कम हैं, क्या करें?
काउंसलर सीमा शर्मा के अनुसार उनके पास आने वाले कॉल्स में अधिकतर स्टूडेंट माक्र्स कम आने से परेशान थे। कोई विषय विशेष की फिर से एग्जाम देने की बात पूछ रहा था तो कोई अपने कॉलेज एडमिशन को लेकिर चिंतित था। शर्मा कहती हैं कि ऐसे वक्त जबकि रिजल्ट करीब 87 प्रतिशत रहा है, फिर भी कम माक्र्स आने से बच्चे टेंशन में हैं। ऐसे क्वेश्चन्स पर काउंसलर्स जवाब में बच्चों को इम्प्रूवमेंट, गैप व अन्य विकल्प के बारे में जानकारी दे रहे हैं। हेल्पलाइन पर कम माक्र्स आने पर कुछ पैरेंट्ïस के कॉल भी आए। 50-60 प्रतिशत माक्र्स प्राप्त करने वाले माक्र्स इम्प्रूवमेंट व अच्छी कॉलेजों में एडमिशन के लिए गैप लेने का परामर्श मांग रहे हैं।
'स्माइल थू्र स्ट्रेस''
बोर्ड के आउटरीच प्रोग्राम के तहत सीबीएसई टेलीफोन हेल्पलाइन के साथ इंटरेक्टिव वॉइस रेस्पॉन्स सिस्टम (ढ्ढङ्कक्रस्) के जरिए वेबसाइट से ऑनलाइन परामर्श भी शुरू किया है। वेबसाइट पर काउंसलर्स की लिस्ट, स्ट्रेस मैनेजमेंट के साथ एक शॉर्ट फिल्म 'स्माइल थू्र स्ट्रेसÓ भी दिखाई जा रही है। फिल्म में पढ़ाई के दौरान आने वाली परेशानियों का हल व स्ट्रेस मैनेज करना बताया गया है।

जयपुर में गणगौर माता की सवारी के दौरान रहेगी यातायात की विशेष व्यवस्था

पुलिस उपायुक्त यातायात श्री हैदर अली जैदी ने बताया कि प्रतिवर्ष की भांति इस वर्ष भी गणगौर माता की सवारी 30 एवं 31 मार्च को साय 6 पी.एम पर न...