टूरिज्म में 'घोस्ट'...राेमांच से भरपूर

चौंकिएगा नहीं, जयपुर आने वाले टूरिस्ट डर से रोमांचित होना चाहते हैं, तभी गाइड उन्हें भूतहा किस्से-कहानियां सुनाते हैं 

जयपुर. भूत की मौजूदगी का अहसास, डरावना माहौल व रोमांचित कर देने वाले किस्से-कहानियां पर्यटकों को आकर्षित कर रही हैं। यही वजह है कि लोग भूतहा जगहों को सैर-सपाटे और छुट्टिïयां बिताने के लिए चुन रहे हैं। जी हां, यूरोपियन कंट्रीज के बाद जयपुर में भी 'घोस्ट टूरिज्म' उभर रहा है। 

टूरिस्ट कुछ नया सुनने का मूड लेकर आते हैं। यहां के किले, महल, पुराने व ऐतिहासिक स्थलों पर गाइडों द्वारा टूरिस्टों को सुनाए जा रहे डरावने किस्से घोस्ट टूरिज्म को बढ़ावा दे रहे हैैं। कुछ जगहों को लेकर डॉक्यूमेंट्रीज और फिल्में भी बन चुकी हैं। जयपुर में फिल्माई गई 'भूल-भूलैया' फिल्म ने भी यहां घोस्ट टूरिज्म को पब्लिसिटी दिलाने का काम किया है। मूवी देखने के बाद डोमेस्टिक टूरिस्ट की रुचि भी घोस्ट टूरिज्म की ओर बढ़ी है। वे गाइड से मांग करते हैं कि उन्हें भूतों से जुड़े किस्से-कहानियां सुनाए जाएं।

टूरिस्ट जानना चाहते हैं...
अधिकतर लोगों को यहां के ऐतिहासिक स्थलों से जुड़े किस्से-कहानियों की जानकारी नहीं होगी, और न ही जानने की उत्सुकता, लेकिन विदेशी टूरिस्ट इन कहानियों को पसंद कर रहे हैं। जयपुर टूरिस्ट गाइड एसोसिएशन के संरक्षक डॉ. महावीर सिंह नाथावत के अनुसार कुछ टूरिस्ट तो सिर्फ ऐसी ही लोकेशन्स पर जाना चाहते हैं, जो किसी न किसी रहस्य व भूतहा कहानियों में शामिल हो। विदेशी टूरिस्ट्ïस की हिस्टॉरिकल नॉलेज के साथ रोमांचक व रहस्यमयी बातें जानने में रुचि होती है। ऐसे टूरिस्ट की संख्या अब लगातार बढ़ रही है।

'भूतों का  भानगढ़' अब खण्डहर 
अरावली हिल्स के घने जंगलों के बीच बना भानगढ़ अब खण्डहर में तब्दील हो चुका है। इसको लेकर इतने रहस्यमयी किस्से-कहानियां प्रचलित हैैं कि इसे आम बोलचाल में भूतों का भानगढ़ कहा जाता है। इस पर पिछले दिनों Óभूतों का भानगढ़Ó नाम से फिल्म भी बन चुकी है। इसके बाद टूरिस्ट्स की भी इन किस्सों में रुचि बढ़ गई है। यहां पास से ही नदी गुजरती है, जिसकी आवाज सन्नाटे को अजीब सा बना देती है। भारतीय पुरातत्व विभाग का भानगढ़ फोर्ट से एक मील दूर बना ऑफिस इस डर को और बढ़ाता है। रात्रि में यहां किसी के भी रुकने पर सख्त पाबंदी है। विभाग की इन अतिरिक्त सावधानियों ने टूरिस्ट्स के मन में इसके बारे में और अधिक जानने की जिज्ञासा बढ़ा दी है। www.4to40.com वेबसाइट के अनुसार भानगढ़ इंडिया के टॉप टेन घोस्ट हंटेड प्लेसेज में शामिल है। यहां की वीडियो फिल्म्स और फोटो भी यू ट्ïयूब जैसी वेबसाइट्ïस पर बड़ी संख्या में हैैं।

क्या है घोस्ट टूरिज्म
क्या है घोस्ट टूरिज्मदरअसल यूरोप में घोस्ट टूरिज्म का फंडा पुराना है। वहां लोग भूतहा जगहों पर जाकर रोमांचित होते रहते हैं। वे भूतों के अस्तित्व को जानने व परखने के लिए ऐसी जगहों पर रुकते हैं और वहां के डर को महसूस करते हैं। भूतहा जगहों पर रुक कर भूतों के डर को भगाने (घोस्ट हंटिंग) का शौक उनमें दीवानगी की हद तक है। इसे ही घोस्ट टूरिज्म का नाम दिया गया है। अब यही शौक यूरोपियन लोग पिंकसिटी में पूरा कर रहे हैं।

सब रोमांच के लिए
रहस्यमयी किस्सों में सत्यता चाहे कुछ भी हो, इससे टूरिस्ट्स को कुछ खास मतलब नहीं। गाइड बताते हैं कि उन्हें तो सिर्फ  उस डर को एंजॉय करना है। इसी डर की वजह से नाहरगढ़, भानगढ़, आमेर, आमेर स्थित भूतेश्वर महादेव मंदिर तथा जयगढ़ जैसी जगह घोस्ट टूरिज्म के आकर्षण का केन्द्र हैं। हम भी किवदंतियों के अनुसार किस्से सुनाते हैं।

घोस्ट हंटर्स की पसंद
आप अनुमान लगा सकते हैं कि कुछ लोग भूत बंगलों व महलों में वहां की कला देखने नहीं अपितु भूतों का शिकार करने जाते हैं। ये लोग भूत के शिकार(घोस्ट हंटिंग) के लिए छुट्टिïयों में भूतहा महल यात्राओं पर आते हैं। रोमांच से भरपूर इन यात्राओं में यूरोपियन घोस्ट हंटर्स सोसायटी के लोग अधिक होते हैं। जयपुर घूमने आए टूरिस्ट मार्क पीटर जो न्यू जर्सी घोस्ट हंटर्स क्लब के मेम्बर हैं, बताते हैं कि उटाह घोस्ट हंटर्स सोसायटी, फिलाडेल्फिया घोस्ट हंटर एलायंस साउथ मिशिगन, न्यू जर्सी घोस्ट हंटर्स और ऐसे ही ऑर्गेनाइजेशन्स से जुड़े लोगों के लिए जयपुर लोकेशन पसंदीदा बनती जा रही है।

यूरोप में घोस्ट टूरिज्म का चलन काफी बढ़ चुका है। हमने राजस्थान में भी ऐसी जगहों के बारे में सुना है, जिनसे भूतहा कहानियां जुड़ी हुई हैं। मैं और मेरे पति दोनों इस बार छुट्टिïयों में ऐसी ही जगह घूमने वाले हैं।
- एलिन निकोलस, टूरिस्ट, कनाडा
आमेर फोर्ट के तहखाने में अमरीकी टूरिस्‍ट एलिन व बैंजामिन।
मैंने इंडिया आने से पहले इंटरनेट पर यहां के टॉप डेस्टिनेशन्स के बारे में जाना है। हैरिटेज के साथ मुझे वहां की ओल्ड स्टोरीज में भी इंटरेस्ट है। मैं पुरानी जगहों से जुड़ी कहानियों के बारे में भी जानने को उत्सुक हूं। घोस्ट हंटेड भानगढ़ भी मेरी लिस्ट में है, मैं वहां जरूर जाना चाहुंगा, सुना है वहां आज भी भूतों का राज है! सत्यता कुछ भी हो, लेकिन मजा आता है।
- बैंजामिन, टूरिस्ट, अमरीका

बदले एजुकेशन सिस्टम

राजस्थान विश्वविद्यालय के सीनेटर, राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के सदस्य के साथ विभिन्न महत्वपूर्ण पदों रहते हुए अपनी सेवाएं देने वाले शिक्षाविद्ï अमर चन्द्र जैन किसी परिचय के मौहताज नहीं हैं। शिक्षा क्षेत्र में विगत 55 साल से अपनी सेवाएं देने वाले जैन आज भी अपने लेखन व विचारों से शिक्षा जगत में अपना योगदान दे रहे हैं। इनके विचारों में वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में आमुलचुल परिवर्तन की जरूरत है। हाल ही में उनके इन विचारों के साथ मैं मुखातिब हुआ। पेश है उनसे बातचीत के कुछ अंश-

मेरी प्रारम्भिक शिक्षा-दीक्षा अलवर जिले की लक्ष्मणगढ़ तहसील में हुई। ग्रेजुएशन के बाद मैं हायर एजुकेशन के लिए मुझे जयपुर आना पड़ा। यहां महाराजा कॉलेज से एम.कॉम. के बाद एल.एल.बी. की डिग्री ली। पढऩे-लिखने में मेरी रुचि शुरु से रही यही कारण रहा कि आगे चलकर मैंने अपने कॅरियर के रूप में शिक्षा क्षेत्र का चुना।

मिला जॉब सेटिसफिकेशन
मैंने ग्रेजुएशन के बाद पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी की। अब मेरे सामने कॅरियर के कई रास्ते थे। इसी बीच मैंने एल.एल.बी. की पढ़ाई की। लेकिन अब भी मेरा वकालत करने का मानस नहीं बना। बात अपने सिद्धान्तों व अभिरुचि की थी। अन्तत: मैंने बी.एड. करने का फैसला किया। शिक्षण क्षेत्र में अपने कॅरियर की शुरुआत करने के बाद मुझे जॉब सेटिसफिकेशन मिला। अध्यापन का काम शुरू से ही आदर्श रहा है। लेकिन वर्तमान में यह बाजारीकरण का शिकार होता जा रहा है। कॉचिंग व ट्ïयूशन के नाम पर होने वाला कारोबार फलफूल रहा है। ऐसे में सरकारी व्यवस्था आज भी ठीक साबित हो रही है, क्योंकि यहां पर शिक्षकों की नियुक्ति का आधार योग्यता है। वेतनमान बढऩे से अब प्रतिभावान व महत्वाकांक्षी युवा वर्ग भी इस ओर आकर्षित हुआ है।

लेकिन सबसे अहम बात शिक्षा से व्यक्तित्व निर्माण
शिक्षा का मूल उद्देश्य व्यक्तित्व निर्माण करना है। आधुनिक शिक्षा पद्दति में अब इन सिद्धानों को दरकिनार कर दिया है। नैतिक शिक्षा व शाररीरिक शिक्षा के पिरियड अब स्कूलों से गायब होते जा रहे हैं। वर्तमान में शिक्षा को रोजगार का साधन समझा जा रहा है। डिप्लोमा डिग्री कोर्स अब एकमात्र अच्छी नौकरी का माध्यम बनकर रह गए हैं। ऐसे में यदि जल्द ही चेता नहीं गया तो इसका खमियाजा पूरे समाज को भुगतना पड़ेगा।
नम्बर का खेल हो खत्म
मेरा मानना है कि एग्जाम के नाम पर बच्चों में भय का वातावरण बिल्कुल खत्म हो जाना चाहिए। इसके लिए अपने एजुकेशन सिस्टम में बदलाव के साथ पेरेंट्ïस की मानसिकता में भी परिवर्तन जरूरी है। मैंने कई बार देखा है कि बच्चे 90 प्रतिशत से अधिक अंक हासिल करने के बाद भी संतुष्टï नहीं दिखते। नम्बरों का यह खेल उन्हें कुण्डा का शिकार बना देता है। इसके लिए ग्रेड सिस्टम कारगर साबित हो सकता है। जल्द ही सीबीएसई भी उच्च कक्षाओं में इसी तरह का ग्रेडिंग सिस्टम लागू करने वाला है।
जेनरेशन गेप बड़ी समस्या
कभी संयुक्त परिवार ही होते थे। एकल परिवार पर अगुंली उठाने वालों की कमी नहीं थी, लेकिन अब बात बिल्कुल विपरीत हो गई है। जेनरेशन गेप की समस्या ने संयुक्त परिवार के कॉन्सेप्ट को ही खारीज कर दिया है। आधुनिक परिवेश व शहरी जीवनशैली में संयुक्त परिवार व्यवहारिक तौर पर भी टेढ़ी खीर बन के रह गए है। लेकिन हां, यह भी सही है कि जेनरेशन गेप की समस्या ग्लोबलाइजेशन के साथ बढ़ती जा रही है।
तैयार किया ब्लू पिं्रट
मुझे आज भी याद है जब माध्यमिक शिक्षा बोर्ड ने पहली बार मल्टी च्वाइस टाइप प्रश्नों को परीक्षा प्रश्न पत्रों में शामिल किया गया। उस समय मैं बोर्ड के मैम्बर्स में था और लेखाशास्त्र के सेम्पल पेपर्स और ब्लू प्रिंट मैंने ही तैयार किए थे। यह परिवर्तन बच्चों के लिए उत्तर देने में आसान भी साबित हुआ और सेलेबस को पूरी तरह से कवर करने के लिए व्यवहारिक भी।
कल किसने देखा है
मैं हमेशा वर्तमान में जीया हूं। भविष्य के गर्भ में क्या छिपा है इसकी चिंता भला क्यूं करें। भूत व भविष्य की चिंता कर अपने आज को कभी प्रभावित नहीं होने दिया। अपने सेवाकाल में भी इसी सिद्धान्त पर काम किया। अपनी पोस्टिंग को लेकर कभी मोह नहीं रखा, यहीं कारण रहा कि विभिन्न विभागों में काम करते हुए मैंने कई जगहों पर पोस्टेड रहा।
सख्त काननू व चुस्त प्रशासन हो
देश और दुनिया के लिए आतंकवाद सबसे बड़ी चुनौति बन गया है।  हाल ही में मुम्बई की आतंकी घटना भारतीय खुफिया तंत्र पर तमाचा साबित हुई है। सुरक्षाकर्मियों के पास हथियारों की बात करें अथवा कानूनी खामियों की, सुधार की जरूरत है। अब आतंक के इससे निपटने का समय आ गया है। पाकिस्तान पर आर्थिक व राजनैतिक दबाव डालने के प्रयास जरूरी है।
उपलब्धियां
सन 2007 में राजस्थाना जन मंच की ओर से 'समाज रत्न' सम्मान
राजस्थान विश्वविद्यालय के सीनेटर रहे
माध्यमिक शिक्षा बोर्ड, राजस्थान के सदस्य
विभिन्न शिक्षा बोर्डों में आठ से ज्यादा पाठ्ïय पुस्तके प्रकाशित
शोभा स्मृति कोष चैरीटी ट्रस्ट के चैयरमैन
लेखाशास्त्र पर आधा दर्जन से अधिक पुस्तकों का लेखन

इंश्योरेंस के बावजूद स्टूडेंट अरसुरक्षित

-अवेयरनेस के अभाव में काम नहीं आ रही गवर्नमेंट की इंश्योरेंस स्कीम

जयपुर. देश के भावी नागरिकों स्टूडेंट्स की सुरक्षा के लिए गवर्नमेंट की ओर से शुरू की गई महत्वाकांक्षी इंश्योरेंस स्कीम उदासिनता का शिकार हो गई है। अवेयरनेस की वजह से स्टूडेंट्स तक इसका फायदा नहीं पहुंच पाया है। सड़क दुर्घटना एवं अकाल मौत का शिकार होने वाले विभिन्न गवर्नमेंट व प्राइवेट स्कूल स्टूडेंट्स के लिए करीब ४ साल पहले शुरू की गई विद्यार्थी सुरक्षा दुर्घटना बीमा योजना फाइलों में दम तोड़ रही है। एक्सपर्ट्र्स के अनुसार इसके पीछे संस्था प्रधानों की अरुचि और शिक्षा विभाग की उदासिनता सबसे बड़ा कारण है।  यही कारण है कि इस स्कीम का लाभ स्टूडेंट्स को नहीं मिल पा रहा है। 



योजना के पूर्ण रूप से क्रियान्वयन नहीं होने पर इसमें संशोधन कर प्रीमियम राशि को भी कम किया गया, इसके बावजूद भी नतीजा शून्य ही रहा। प्रदेश के विभिन्न जिलों में अनुदानित, गैर अनुदानित और निजी शिक्षण संस्थानों के छात्रों की सुरक्षा को लेककर अप्रैल २००६ में इस योजना की शुरुआत की गई, लेकिन यह अपने प्रारंभिक दौर में ही परवान न चढ़ सकी। राज्य बीमा एवं प्रावधायी निधि विभाग ने कक्षा एक से आठ एवं नौ से बारह तक के विद्यार्थियों से ५६ रुपए प्रीमियम राशि लेकर विद्यार्थी सुरक्षा बीमा योजना के तहत बीमा करने संबंधी परिपत्र जारी किया था। आरंभिक दौर में ही योजना के धूल फांकने पर विभाग ने नियमों में तब्दीलियां करते हुए कक्षा एक से आठ तक के विद्यार्थियों से दस रुपए एवं कक्षा नौ से बारह तक के विद्यार्थियों से पच्चीस रुपए प्रीमियम राशि लेकर दस से बीस हजार रुपए का बीमा तथा २५ रुपए प्रीमियम वाले छात्रों का ५० हजार रुपए का बीमा करने के आदेश दिए थे।

नहीं हैं जानकारी-

कई सरकारी एवं गैर सरकारी स्कूलों के संस्था प्रधानों को इस योजना के बारे में जानकारी तक नहीं है। उनका कहना है कि उन्हें इस आशय बाबत आदेश भी प्राप्त नहीं हुए हैं। वहीं निजी शिक्षण संस्थानों के संचालकों का कहना है कि योजना का स्वरुप स्वैच्छिक है अत: वह अभिभवकों पर दबाव भी नहीं डाल सकते। योजना को लागू करने के लिए विद्यालयों में होर्डिंग और बोर्ड लगाने तथा गोष्ठियां आयोजित कर छात्रों और अभिभावकों को इस योजना के विषय में संपूर्ण जानकारी और फायदे बताए जाने थे, लेकिन यह भी संभव नहीं हो पाया।

इधर योजना के सफल मूर्तरूप न ले पाने के कारण शिक्षा विभाग ने समस्त ब्लॉक शिक्षा अधिकारियों को अभिभावकों और छात्रों को प्रेरित करने में ढिलाई बरतने वालों के विरूद्ध कार्यवाही के आदेश भी जारी किए थे, लेकिन योजना के साथ ही इन आदेशों की भी पालना नहीं की गई और छाद्ध कल्याण से जुड़ी एक स्वर्णिम योजना फाइलों में धूल फांक रही है।


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